चाहता हूँ ख़ुशी के गीत लिखूं
मगर इस स्याह-ऐ-दर्द-ऐ- कलम का क्या करुँ.
जमी महफ़िलों में मुस्कुरा भी लूं
मगर इस गुबार-ऐ- दिल का क्या करुँ.
अंदाज़ा नहीं कि ग़म कितना है मेरा
मैं इस बदस्तूर बढ़ते ग़म का क्या करुँ.
लहू का कतरा कतरा देने से गुरेज नहीं
मगर इस ठंडे से खूँ का क्या करुँ.
इक बार फिर से मुहब्बत तो कर लूं
मगर इस नाफरमान दिल का क्या करुँ.
सजदा करुँ मैं दुआ भी मांग लूं
मगर उस बहरे खुदा का क्या करुँ.
किसी से बैर नहीं ना खफा हूँ मैं
मगर एहसान फ़रामोश दोस्तों का क्या करुँ.
इन खारे अश्कों की कसम रोना नहीं चाहता
मगर जो हँसते हैं मुझपे उनका क्या करुँ.
Saturday, November 26, 2011
आप रूठा ना करें
आप हमसे ना रूठा करें जानम
रुठिये गर तो मान जाइए भी.
अपनी जुल्फों को बाँध के रखिये
खुली जुल्फें तो बस क़यामत हैं
वैसे हैं इक छुई मुई सी कली
पर जमाने के लिए आफत हैं
आप गुस्से में और हसीं लगती हैं
तुनकिये पर थोड़ा मुस्कुराइए भी.
आपकी आँखों में बोतल का नशा
हर अदा आपकी औरों से जुदा
आम इंसानों की बात ही क्या है
आह भरता होगा खुदा
कबसे दिल थाम के बैठे हैं
इठलाकर बाहों में आइये भी.
रुठिये गर तो मान जाइए भी.
अपनी जुल्फों को बाँध के रखिये
खुली जुल्फें तो बस क़यामत हैं
वैसे हैं इक छुई मुई सी कली
पर जमाने के लिए आफत हैं
आप गुस्से में और हसीं लगती हैं
तुनकिये पर थोड़ा मुस्कुराइए भी.
आपकी आँखों में बोतल का नशा
हर अदा आपकी औरों से जुदा
आम इंसानों की बात ही क्या है
आह भरता होगा खुदा
कबसे दिल थाम के बैठे हैं
इठलाकर बाहों में आइये भी.
Friday, November 25, 2011
इल्तेजा
तुमको देखा तो लगा ऐसे
कोई बिछड़ा हुआ मिला मुझको.
ज़िन्दगी से बहुत शिकायत थी
अब कोई भी नहीं गिला मुझको.
जाके मयखाने शराब पीता था
बैठ यूँ आँखों से पिला मुझको.
इक जमाने से मैं तो सोया नहीं
अपनी जुल्फों में तू सुला मुझको.
जिंदा इक लाश बन चुका हूँ मैं
होंठों से छूके जिला मुझको.
लोगों ने ढायें हैं सितम इतने
कम से कम तू तो न रुला मुझको.
घूरती हैं निगाहें सबकी
उनकी नज़रों से बचा मुझको.
इसके पहले कि फनां हो जाऊं
गर्म बाहों में तू छुपा मुझको.
कोई बिछड़ा हुआ मिला मुझको.
ज़िन्दगी से बहुत शिकायत थी
अब कोई भी नहीं गिला मुझको.
जाके मयखाने शराब पीता था
बैठ यूँ आँखों से पिला मुझको.
इक जमाने से मैं तो सोया नहीं
अपनी जुल्फों में तू सुला मुझको.
जिंदा इक लाश बन चुका हूँ मैं
होंठों से छूके जिला मुझको.
लोगों ने ढायें हैं सितम इतने
कम से कम तू तो न रुला मुझको.
घूरती हैं निगाहें सबकी
उनकी नज़रों से बचा मुझको.
इसके पहले कि फनां हो जाऊं
गर्म बाहों में तू छुपा मुझको.
Thursday, November 24, 2011
दीवाना- भाग दो
क्या बताऊँ मैं कैसे जहर पी गया
था तो कड़वा बहुत फिर भी मैं पी गया.
उसने छोड़ा नहीं था कोई भी कसर
मरते मरते भला कैसे मैं जी गया.
कुछ लिया कुछ दिया जाता है इश्क में
रातभर क्या मिला जोड़ता रह गया.
उसने चाही थी बस दो घड़ी की दोस्ती
और मैं था कि जो था वो सब दे गया.
भर गया हर जखम उससे पाए हुए
देखिये दाग दिल पे मगर रह गया.
मेरे सीने से लगकर कभी रोया था
वो काजल लगा शर्ट हाथ लग गया.
यह वही हैं कभी जो मेरे होते थे
मगर आज सिर्फ अजनबी रह गया.
मुद्दतों बाद फिर सामना जब हुआ
इक पुराना सा घाव कहीं जग गया.
था तो कड़वा बहुत फिर भी मैं पी गया.
उसने छोड़ा नहीं था कोई भी कसर
मरते मरते भला कैसे मैं जी गया.
कुछ लिया कुछ दिया जाता है इश्क में
रातभर क्या मिला जोड़ता रह गया.
उसने चाही थी बस दो घड़ी की दोस्ती
और मैं था कि जो था वो सब दे गया.
भर गया हर जखम उससे पाए हुए
देखिये दाग दिल पे मगर रह गया.
मेरे सीने से लगकर कभी रोया था
वो काजल लगा शर्ट हाथ लग गया.
यह वही हैं कभी जो मेरे होते थे
मगर आज सिर्फ अजनबी रह गया.
मुद्दतों बाद फिर सामना जब हुआ
इक पुराना सा घाव कहीं जग गया.
Wednesday, November 23, 2011
दीवाना
आपको देखकर देखता रह गया
रातभर ख़्वाब में, सोचता रह गया.
इश्क में कुछ तो होश यारों रहता नहीं
खुद से लापता हुआ, लापता रह गया.
मैं समझने लगा आप भी समझ गए
थे लब सिले आँखों से, बोलता रह गया.
इक झलक से ही दिल ये बहल जाता था
मैं इधर से उधर, नापता रह गया.
हाथ जब भी उठे माँगा आपको ही रब से
मांगने की थी लत, मांगता रह गया.
आप रुसवा ना कर दें ये डर भी तो था
दिल में ही चाहता था, चाहता रह गया.
दोस्तों में मजाक बनके मशहूर था
बेहूदा शायद था, बेहूदा रह गया.
तय किया दिल की बात आज बोल दूंगा मैं
उसकी महफ़िल में जाके, ताकता रह गया.
है गुजारिश मेरी आशिकों की कौम से
जाके कह दो दीवाना, आपका मर गया.
रातभर ख़्वाब में, सोचता रह गया.
इश्क में कुछ तो होश यारों रहता नहीं
खुद से लापता हुआ, लापता रह गया.
मैं समझने लगा आप भी समझ गए
थे लब सिले आँखों से, बोलता रह गया.
इक झलक से ही दिल ये बहल जाता था
मैं इधर से उधर, नापता रह गया.
हाथ जब भी उठे माँगा आपको ही रब से
मांगने की थी लत, मांगता रह गया.
आप रुसवा ना कर दें ये डर भी तो था
दिल में ही चाहता था, चाहता रह गया.
दोस्तों में मजाक बनके मशहूर था
बेहूदा शायद था, बेहूदा रह गया.
तय किया दिल की बात आज बोल दूंगा मैं
उसकी महफ़िल में जाके, ताकता रह गया.
है गुजारिश मेरी आशिकों की कौम से
जाके कह दो दीवाना, आपका मर गया.
Sunday, November 20, 2011
दिल के बहाने
दिल धड़कने का बहाना ढूंढें
तुमसे मिलने का बहाना ढूंढें
इस कदर बेक़रार रहता है
तुम्हें देखने का बहाना ढूंढें.
जब घटाओं से फुहार झरता है
जब फिजाओं पे निखार आता है
कहीं दो दिल जवान मिलते हैं
जब भी मौसम खुशगवार होता है
ख़्वाब बुनने का बहाना ढूंढें. दिल धड़कने का बहाना ढूंढें
तू है कमसिन नाज़ुक सी कली
तुझपे सोलह श्रृंगार सोहे
सुर्ख होंठों से छलकता है नशा
मुझे कजरारे नैना मोहे
कोई छूने का बहाना ढूंढें. दिल धड़कने का बहाना ढूंढें
तुमसे मिलने का बहाना ढूंढें
इस कदर बेक़रार रहता है
तुम्हें देखने का बहाना ढूंढें.
जब घटाओं से फुहार झरता है
जब फिजाओं पे निखार आता है
कहीं दो दिल जवान मिलते हैं
जब भी मौसम खुशगवार होता है
ख़्वाब बुनने का बहाना ढूंढें. दिल धड़कने का बहाना ढूंढें
तू है कमसिन नाज़ुक सी कली
तुझपे सोलह श्रृंगार सोहे
सुर्ख होंठों से छलकता है नशा
मुझे कजरारे नैना मोहे
कोई छूने का बहाना ढूंढें. दिल धड़कने का बहाना ढूंढें
Saturday, November 19, 2011
आप से मिलकर
आप आये ज़िन्दगी में खुदा बनके
दर्द आया जुबाँ पे दुआ बनके.
हमको तन्हाईयाँ जीने नहीं देंती
दिल का जो जख्म है सीने नहीं देंती
जख्म गहरा गया है बढ़ते बढ़ते.
अपनी हालत भी सुधर जायेगी
ग़म की आंधी भी गुजर जायेगी
सह गया सोचके ग़म हँसते हँसते.
अब तो आलम है कि रो नहीं पाते
रातभर लेट के भी सो नहीं पाते
उम्र हो गयी यूँ ही जगते जगते.
आपसे मिलके उम्मीदें हैं जगी
फिर से लौटी है होठों पे हंसी
आँख भर गयी कैसे कहते कहते.
खुशियाँ मिलती हैं तो डर लगता है
इस ख्याल से भी दिल उदास रहता है
रह ना जाए किस्मत बनते बनते.
हमको अपना बनाकर देखो
अपनी पलकों में बसाकर देखो
फिर से जी जायेंगें मरते मरते.
दर्द आया जुबाँ पे दुआ बनके.
हमको तन्हाईयाँ जीने नहीं देंती
दिल का जो जख्म है सीने नहीं देंती
जख्म गहरा गया है बढ़ते बढ़ते.
अपनी हालत भी सुधर जायेगी
ग़म की आंधी भी गुजर जायेगी
सह गया सोचके ग़म हँसते हँसते.
अब तो आलम है कि रो नहीं पाते
रातभर लेट के भी सो नहीं पाते
उम्र हो गयी यूँ ही जगते जगते.
आपसे मिलके उम्मीदें हैं जगी
फिर से लौटी है होठों पे हंसी
आँख भर गयी कैसे कहते कहते.
खुशियाँ मिलती हैं तो डर लगता है
इस ख्याल से भी दिल उदास रहता है
रह ना जाए किस्मत बनते बनते.
हमको अपना बनाकर देखो
अपनी पलकों में बसाकर देखो
फिर से जी जायेंगें मरते मरते.
Friday, November 18, 2011
अफ़सोस
हुए नाकाम ज़िन्दगी में कुछ इस तरह से
खींच लाये वो कुछ, कर गुजरने की जद से.
ये उनका सुरूर-ऐ- उल्फत का ही असर था
लौट आये हम अपने, मरने की हद से.
हाल-ऐ-दिल जाना न देखा मुडके किसी ने
उन्ही रास्तों में खड़े थे, कबसे ही बुत से.
क्यूँ लुट जाने चले थे उसकी रानाइयों पे
खुदा से नहीं, ये सवाल है हमारा खुद से.
अफ़सोस उसने झूठा प्यार भी न जताया
वैसे अपने वादे से वो मुकर भी सकती थी.
तंगहाली थी पर ज़िन्दगी कोई मजबूरी न थी
इक टीस सी रह गयी कि, ये सुधर भी सकती थी.
खींच लाये वो कुछ, कर गुजरने की जद से.
ये उनका सुरूर-ऐ- उल्फत का ही असर था
लौट आये हम अपने, मरने की हद से.
हाल-ऐ-दिल जाना न देखा मुडके किसी ने
उन्ही रास्तों में खड़े थे, कबसे ही बुत से.
क्यूँ लुट जाने चले थे उसकी रानाइयों पे
खुदा से नहीं, ये सवाल है हमारा खुद से.
अफ़सोस उसने झूठा प्यार भी न जताया
वैसे अपने वादे से वो मुकर भी सकती थी.
तंगहाली थी पर ज़िन्दगी कोई मजबूरी न थी
इक टीस सी रह गयी कि, ये सुधर भी सकती थी.
Tuesday, November 15, 2011
दुनियादारी
अब तो आदत सी हो गयी है, चुप रहने की
हिम्मत नहीं होती है, कुछ कहने की.
लोग मतलब निकाल लेते हैं कई बातों की
मैंने जाना कि तहें होती हैं इन बातों की.
कुछ ना कहिये, चुप रहिये, देखते रहिये
अभी उतरेगी रंगत सबके चेहरों की.
गैर क्या अपने साए भी साथ छोड़ देते हैं
फ़िज़ूल बातें हैं, ना कीजै, जज्बातों की.
हुए हैं पाँव लहू- लहान इस कदर लेकिन
ख़त्म होती नहीं फुर्सत-ऐ- गुनाह, रास्तों की.
आज रोया हूँ मैं, छुपके, जी भर के बहुत
कि समझ आयी अहमियत मिरे अश्कों की.
हिम्मत नहीं होती है, कुछ कहने की.
लोग मतलब निकाल लेते हैं कई बातों की
मैंने जाना कि तहें होती हैं इन बातों की.
कुछ ना कहिये, चुप रहिये, देखते रहिये
अभी उतरेगी रंगत सबके चेहरों की.
गैर क्या अपने साए भी साथ छोड़ देते हैं
फ़िज़ूल बातें हैं, ना कीजै, जज्बातों की.
हुए हैं पाँव लहू- लहान इस कदर लेकिन
ख़त्म होती नहीं फुर्सत-ऐ- गुनाह, रास्तों की.
आज रोया हूँ मैं, छुपके, जी भर के बहुत
कि समझ आयी अहमियत मिरे अश्कों की.
Friday, November 11, 2011
परिवर्तन
हैं जेहन में आज भी
वो स्कूल बस
चाटवाले की ठेली, ग्वाले की डेरी
बनिए की दूकान
वो बड़ा सा नीम का पेड़
मंदिर की घंटी, रामधुन
फेरीवाले, नुक्कड़
वो गली, गली का मोड़
उसकी छत का मुंडेर
पत्थर का टीला, चबूतरा
बहते सीवर, संकरी सडकें
इस अजनबी मुल्क में
अपना शहर ढूँढता हूँ.
वो घंटों इन्तजार करना
उसके लौटने का
इक झलक देखने का
छुप छुप के उसे निहारते रहना
लूटना आँखों की मस्ती
बहकना इधर उधर खोये खोये
तडपना खनकती उस आवाज़ को सुनने के लिए
आँखों में आँखें डाले घंटों बतियाना
धडकनों का बढ़ना, साँसों का तेज़ होना
आज के बाजारू मुहब्बत में
वही असर ढूँढता हूँ.
वो सुकूँ भरी ज़िन्दगी
पक्षियों का चहचहाना
मुर्गे की बाग़, कोयक की कूक
घने बरगद की सुहानी छाँव
सर्दी में अलाव सेंकना
दोस्तों का घर
मौज मस्ती, वो बेफिक्री
किस्से कहानियाँ, कहकहे
चैन की नींद
अलसायी शाम, महकती सुबह
दिन- दोपहर ढूँढता हूँ.
तुलसी का पेड़
होली, रंगोली, मेंहदी और गुलाल
माँ के हाथ का बेसन के लड्डू
गाजर का हलवा, पूरी, पुआ और खीर
रिश्तों की मिठास, गर्माहट स्पर्श की
माँ- बाबा, दादा- दादी,
भैया- दीदी, नाना- नानी
चाचा- चाची और फूफी
मामा- मामी और मौसियाँ
फोन और फेसबुक के दौर में
रहा कसर ढूँढता हूँ.
कुछ छूट गए थे प्रश्न
उनके उत्तर ढूँढता हूँ.
कितना कुछ बदल गया
यही अंतर ढूँढता हूँ.
वो स्कूल बस
चाटवाले की ठेली, ग्वाले की डेरी
बनिए की दूकान
वो बड़ा सा नीम का पेड़
मंदिर की घंटी, रामधुन
फेरीवाले, नुक्कड़
वो गली, गली का मोड़
उसकी छत का मुंडेर
पत्थर का टीला, चबूतरा
बहते सीवर, संकरी सडकें
इस अजनबी मुल्क में
अपना शहर ढूँढता हूँ.
वो घंटों इन्तजार करना
उसके लौटने का
इक झलक देखने का
छुप छुप के उसे निहारते रहना
लूटना आँखों की मस्ती
बहकना इधर उधर खोये खोये
तडपना खनकती उस आवाज़ को सुनने के लिए
आँखों में आँखें डाले घंटों बतियाना
धडकनों का बढ़ना, साँसों का तेज़ होना
आज के बाजारू मुहब्बत में
वही असर ढूँढता हूँ.
वो सुकूँ भरी ज़िन्दगी
पक्षियों का चहचहाना
मुर्गे की बाग़, कोयक की कूक
घने बरगद की सुहानी छाँव
सर्दी में अलाव सेंकना
दोस्तों का घर
मौज मस्ती, वो बेफिक्री
किस्से कहानियाँ, कहकहे
चैन की नींद
अलसायी शाम, महकती सुबह
दिन- दोपहर ढूँढता हूँ.
तुलसी का पेड़
होली, रंगोली, मेंहदी और गुलाल
माँ के हाथ का बेसन के लड्डू
गाजर का हलवा, पूरी, पुआ और खीर
रिश्तों की मिठास, गर्माहट स्पर्श की
माँ- बाबा, दादा- दादी,
भैया- दीदी, नाना- नानी
चाचा- चाची और फूफी
मामा- मामी और मौसियाँ
फोन और फेसबुक के दौर में
रहा कसर ढूँढता हूँ.
कुछ छूट गए थे प्रश्न
उनके उत्तर ढूँढता हूँ.
कितना कुछ बदल गया
यही अंतर ढूँढता हूँ.
Thursday, November 10, 2011
इश्क और फेसबुक
जख्मी दिल और छलनी कलेजा
बेगैरत आशिकों का अंजाम यही है.
आखिर लोगों ने कर लिया इश्क से तौबा
ये हुस्न यूँ ही बदनाम नहीं है.
कैस अब ना होंगे पैदा किसी जमाने में
क्यूंकि लैला का भी नामोनिशान नहीं है.
लगती हैं बोलियाँ इंसानों की आजकल
जज्बातों से खेलना यहाँ आम नहीं है.
अक्ल के नाम पे है बस मांस का इक लोथड़ा
"फेस बुकिंग". और कोई काम नहीं है.
बेगैरत आशिकों का अंजाम यही है.
आखिर लोगों ने कर लिया इश्क से तौबा
ये हुस्न यूँ ही बदनाम नहीं है.
कैस अब ना होंगे पैदा किसी जमाने में
क्यूंकि लैला का भी नामोनिशान नहीं है.
लगती हैं बोलियाँ इंसानों की आजकल
जज्बातों से खेलना यहाँ आम नहीं है.
अक्ल के नाम पे है बस मांस का इक लोथड़ा
"फेस बुकिंग". और कोई काम नहीं है.
Wednesday, November 9, 2011
तजुर्बा
हुस्न होगा वो जमाने के लिए
मेरे लिए तो यारों, मौत का सामान था.
दुश्वारियां रहीं जिस्त में हजारों तरह की
कमबख्त मरना ही बस, आसान था.
क्या क्या ना ग़म मिले वो भी बेहिसाब
क्या कहें मुझपे खुदा, इतना मेहरबान था.
दिल के मामलों में मैं बेवकूफ ही रहा
आज भी यही दिक् है, मैं तब भी परेशान था.
रंज है इल्म हो गया अहले जहां को
और मेरा दिल ही, मुझसे अनजान था.
किया दोस्तों पे ऐतबार मैंने खुद से ज्यादा
क्या खूब दोस्त मिले, हर दोस्त बेईमान था.
मेरे लिए तो यारों, मौत का सामान था.
दुश्वारियां रहीं जिस्त में हजारों तरह की
कमबख्त मरना ही बस, आसान था.
क्या क्या ना ग़म मिले वो भी बेहिसाब
क्या कहें मुझपे खुदा, इतना मेहरबान था.
दिल के मामलों में मैं बेवकूफ ही रहा
आज भी यही दिक् है, मैं तब भी परेशान था.
रंज है इल्म हो गया अहले जहां को
और मेरा दिल ही, मुझसे अनजान था.
किया दोस्तों पे ऐतबार मैंने खुद से ज्यादा
क्या खूब दोस्त मिले, हर दोस्त बेईमान था.
Friday, October 14, 2011
मंजिलें मिल जाती हैं.
हो डगर जितना भी कठिन
मंजिलें मिल जाती हैं
गर इरादा पक्का हो तो
मंजिलें मिल जाती हैं.
रास्ते बन जाते हैं
पर्वतों को तोड़कर
इक महासागर बनता है
बूँद बूँद जोड़कर.
हौसला मत छोड़ना बस
मंजिलें मिल जाती हैं.
दूसरों की बाद में
पहले दिल की सुन ले तू
दिल से थोड़ी गुफ्तगू कर
हो जा खुद से रू-ब-रू.
कुछ नहीं बस, खुद पे यकीं हो
मंजिलें मिल जाती हैं.
इक अमेरिकन था एडिसन
अपनी धुन में रहता था
रच गया इतिहास जो
दुनिया से वो कहता था.
आग हो सीने में तेरे गर
मंजिलें मिल जाती हैं.
मंजिलें मिल जाती हैं
गर इरादा पक्का हो तो
मंजिलें मिल जाती हैं.
रास्ते बन जाते हैं
पर्वतों को तोड़कर
इक महासागर बनता है
बूँद बूँद जोड़कर.
हौसला मत छोड़ना बस
मंजिलें मिल जाती हैं.
दूसरों की बाद में
पहले दिल की सुन ले तू
दिल से थोड़ी गुफ्तगू कर
हो जा खुद से रू-ब-रू.
कुछ नहीं बस, खुद पे यकीं हो
मंजिलें मिल जाती हैं.
इक अमेरिकन था एडिसन
अपनी धुन में रहता था
रच गया इतिहास जो
दुनिया से वो कहता था.
आग हो सीने में तेरे गर
मंजिलें मिल जाती हैं.
Sunday, October 9, 2011
बच्चों के लिए स्वच्छता पर एक कविता
सुबह सवेरे जब भी उठो
ब्रश करना कभी ना भूलो
फिर करो चेहरे के सफाई
बड़ा जरूरी है ये सब भाई.
है खाना जैसे रोज जरूरी
उतना ही जरूरी है रोज नहाना
गर्मी सर्दी कोई हो मौसम
करो ना कोई कभी बहाना.
परहेज़ करो बाहर की चीज़ों से
खाओ धोकर फल- तरकारी
अगर ना मानो मेरी बातें
होगी तुमको निश्चय बीमारी.
डरेगी तुमसे हर बीमारी
खाओ पीओ बस ठीक तरह से
कुट्टी कर लो गंदी चीज़ों से
और ठाठ करो तुम रहो मज़े से.
खेलोगे कूदोगे पढोगे
तभी जो तुम स्वस्थ रहोगे
आस पास तुम रखो सफाई
इसी में है हम सबकी भलाई.
ब्रश करना कभी ना भूलो
फिर करो चेहरे के सफाई
बड़ा जरूरी है ये सब भाई.
है खाना जैसे रोज जरूरी
उतना ही जरूरी है रोज नहाना
गर्मी सर्दी कोई हो मौसम
करो ना कोई कभी बहाना.
परहेज़ करो बाहर की चीज़ों से
खाओ धोकर फल- तरकारी
अगर ना मानो मेरी बातें
होगी तुमको निश्चय बीमारी.
डरेगी तुमसे हर बीमारी
खाओ पीओ बस ठीक तरह से
कुट्टी कर लो गंदी चीज़ों से
और ठाठ करो तुम रहो मज़े से.
खेलोगे कूदोगे पढोगे
तभी जो तुम स्वस्थ रहोगे
आस पास तुम रखो सफाई
इसी में है हम सबकी भलाई.
Wednesday, October 5, 2011
तनहा शाम
वो तो आये नहीं इस बार
तनहा फिर कटेगी शाम.
बेकरारी बढ़ी फिर से
परेशां इस कदर है दिल
संभाले कैसे खुद को हम
ना वो आये नज़र कबसे.
ना आया ही कोई पैगाम
तनहा फिर कटेगी शाम.
उनकी बातों में जादू है
नशा आँखों में है यारों
झूम कर चलें ऐसे
मचल जाएँ दिल के अरमाँ.
मज़ा देता नहीं अब जाम
तनहा फिर कटेगी शाम.
डूबकर यादों में उनकी
गुजर जाए ये ज़िन्दगी
ना कोई और ख्वाहिश है
सिवा चाहें उन्हें यूँ ही.
लव पे आये उन्ही का नाम
तनहा फिर कटेगी शाम.
तनहा फिर कटेगी शाम.
बेकरारी बढ़ी फिर से
परेशां इस कदर है दिल
संभाले कैसे खुद को हम
ना वो आये नज़र कबसे.
ना आया ही कोई पैगाम
तनहा फिर कटेगी शाम.
उनकी बातों में जादू है
नशा आँखों में है यारों
झूम कर चलें ऐसे
मचल जाएँ दिल के अरमाँ.
मज़ा देता नहीं अब जाम
तनहा फिर कटेगी शाम.
डूबकर यादों में उनकी
गुजर जाए ये ज़िन्दगी
ना कोई और ख्वाहिश है
सिवा चाहें उन्हें यूँ ही.
लव पे आये उन्ही का नाम
तनहा फिर कटेगी शाम.
Monday, September 26, 2011
दर्द का रिश्ता
दर्द का मैं तुम्हें बताऊँ
रहा है रिश्ता बड़ा पुराना
ना इसके बिन मुझे सुकूँ है
ना मेरे बिन इसका ठिकाना.
कभी जो मांगी थी अपनी खातिर
वही दुआएं देता हूँ तुमको
किसी ख़ुशी की ना कोई ख्वाहिश
ना कुछ भी पाने की है तमन्ना.
कभी निकलते हैं जब ये आंसू
कभी तड़पता है जब मेरा दिल
मज़ा कुछ आने लगा इतना
ढूढूँ कोई नया बहाना.
सबसे पीछे रह गया मैं
निकल गया आखिरी कारवां भी
वक़्त बदला कि लोग बदले
बदल गया हर इक फ़साना.
रहा है रिश्ता बड़ा पुराना
ना इसके बिन मुझे सुकूँ है
ना मेरे बिन इसका ठिकाना.
कभी जो मांगी थी अपनी खातिर
वही दुआएं देता हूँ तुमको
किसी ख़ुशी की ना कोई ख्वाहिश
ना कुछ भी पाने की है तमन्ना.
कभी निकलते हैं जब ये आंसू
कभी तड़पता है जब मेरा दिल
मज़ा कुछ आने लगा इतना
ढूढूँ कोई नया बहाना.
सबसे पीछे रह गया मैं
निकल गया आखिरी कारवां भी
वक़्त बदला कि लोग बदले
बदल गया हर इक फ़साना.
Friday, January 7, 2011
मैं कौन हूँ
जिसे माज़ी१ का पता
ना जमान ऐ हाल२ का होश
ना आकबत३ की खबर
ना भूत, ना भविष्य
ना वर्तमान हूँ.
मैं कौन हूँ?
जिस खुदा को ना देखा कभी
ना सुना, ना महसूस किया
कहते हैं उसी का
इक अक्स हूँ.
मैं कौन हूँ?
जहां उठती है इक हूक सी
हर रोज
मुफ्त बीमारियों की दूकान या
गालिबन४ अन्दाखता५ हूँ.
मैं कौन हूँ?
जीने की ख्वाहिश है जिसे
जाते हुए तुर्बत६ में भी
किस फ़िक्र में गुजर गयी
कमबख्त ज़िन्दगी
सोजिश७ या हवस हूँ.
मैं कौन हूँ?
१ इतिहास, २ वर्तमान, ३ भविष्य, ४ बहुत संभव है कि, ५ त्यक्त, ६ कब्र, ७ मानसिक कष्ट
ना जमान ऐ हाल२ का होश
ना आकबत३ की खबर
ना भूत, ना भविष्य
ना वर्तमान हूँ.
मैं कौन हूँ?
जिस खुदा को ना देखा कभी
ना सुना, ना महसूस किया
कहते हैं उसी का
इक अक्स हूँ.
मैं कौन हूँ?
जहां उठती है इक हूक सी
हर रोज
मुफ्त बीमारियों की दूकान या
गालिबन४ अन्दाखता५ हूँ.
मैं कौन हूँ?
जीने की ख्वाहिश है जिसे
जाते हुए तुर्बत६ में भी
किस फ़िक्र में गुजर गयी
कमबख्त ज़िन्दगी
सोजिश७ या हवस हूँ.
मैं कौन हूँ?
१ इतिहास, २ वर्तमान, ३ भविष्य, ४ बहुत संभव है कि, ५ त्यक्त, ६ कब्र, ७ मानसिक कष्ट
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