Saturday, July 17, 2010

जब मैं उदास होता हूँ

मैं जब उदास होता हूँ
आस्मां की तरफ देखता हूँ
उसके फैलाव और ऊँचाई को
मापता हूँ
उसकी आखों में झांकता हूँ
और महसूस करता हूँ
जैसे उसकी बाहें बुला रहीं हों मुझे.

जब मैं उदास होता हूँ
समंदर की तरफ देखता हूँ
उसकी लहरों को, उफान को
वेग और प्रवाह को
और महसूस करता हूँ
धडकनों में
उठते हुए तूफानों को.

जब कभी भी उदास होता हूँ
देखता हूँ चमकते हुए तारों को
हर हाल में
टिमटिमाते हुए
अंधेरों में
झिलमिलाते हुए
और महसूस करता हूँ
आँखों में
उम्मीद की एक नई किरण.

Friday, July 9, 2010

नासिख१

मुझ जैसे मुहर्रिर१ की
ज़िन्दगी भी कोई ज़िन्दगी है?
क्या हासिल हुआ कलम घिस घिस कर?
खिस्सत२ की ज़िन्दगी
जिया मैं
खैरात पे बसर किया
फांके मारे हैं दिनों तक
ग़ालिब मुझे तो
दो घूँट भी नसीब नहीं हुई.

तकरीक३ ना हुआ कोई
ना किसी का खूँ ही खौला
ना पशेमानी४ आई
जो भी लिखा, बेकार हुआ.

बुत सा पडा हूँ
इस नाज़ेब५ और
नाचाक६ सी दुनिया में
नाचीज़ की तरह
कोई दर्यां७ हो तो
बताओ भाई
ढूंढ दो कोई हमदर्द मिरा
जो तहमीद८ करे
मेरी खातिर
जो तस्हीह९ कर दे
मेरी तलफ१० होती
यावा सी ज़िन्दगी.

एक मौक़ा और मिले तो
तरमीम११ भी कर लूं
जी लूं उनकी तरह भी;
इस तर्रार१२, फ़रऊन१३ दुनिया,
जो फ़वायद१४ की बुनियाद पर टिकी है
के किसी काम नहीं रहा.

बशरियत१५ नहीं रही
दोज़ख१६ क्या जन्नत क्या.

मायने-
१ लेखक, २ कंजूसी, ३ उत्तेजित, ४ शर्म, ५ बेमेल, ६ बेमजा, ७ इलाज़, ८ ईश्वर से प्रार्थना, ९ दुरुस्त, १० बर्बाद, ११ सुधार,१२ तेज, १३ जालिम, १४ फायदों, १५ इंसानियत, १६ नरक

Saturday, July 3, 2010

ज़िन्दगी क्या है

कुछ लफ्ज़ ऐसे होते हैं
जिन्हें बयाँ कर पाना
उनके बारे में कुछ
कह पाना
बेहद मुश्किल होता है
मसलन एक लफ्ज़ है
ज़िन्दगी!!

ज़िन्दगी
लम्हों और एहसासों के बीच का
एक अजीबोगरीब रिश्ता है
अमीक रब्त है उनका
जैसे हर लम्हा अलग है
एक दूसरे से
वैसे ही
हर एक एहसास जुदा जुदा है
एक दूसरे से
कभी जब सोचता हूँ
कि कितना कुछ लिखा है
मैंने इस ज़िन्दगी के बारे में
तो हर बार लगता है
अभी कितना कुछ है लिखने को
बहुत कुछ बाकी है अभी
जिसे सोचा तक नहीं
अभी देखा ही कहाँ ज़िन्दगी को
ठीक से.

ज़िन्दगी एक ख्याल है.
ख़्वाब है.
अनसुलझी पहेली या अधूरी रह गयी
जरूरत
जज्बात, मौसिकी या एक खूबसूरत ग़ज़ल?
यादों की हरी डालियों पर
बातों की कोमल पत्तियाँ है ज़िन्दगी
आसूँओं की बरसात में
धुली उन पत्तियों की लताफत है ज़िन्दगी
वक़्त की रफ़्तार से
तेज़ है ज़िन्दगी
नाज़ुक कभी चट्टान है ज़िन्दगी
दरिया के पानी की तरह मगरूर है
ज़िन्दगी
खुदा की सनक है
इंसानी दुआ है ज़िन्दगी
जहां समझा शुरुआत है
वहीँ ख़त्म मिली है ज़िन्दगी
ज़िन्दगी
तू ही बता
क्या है
ज़िन्दगी!!

इंतज़ार

बड़ी देर तक
खिड़की से झांकता रहा
रोज की तरह
कि कोई गुजरेगा
इन रास्तों से होकर
जिसके इन्तजार में
बरसों नहीं गुजरे
वो यूँ ही किसी दिन
गुजरेगा इधर से
और पुकार कर कहेगा
"किसकी राह देख रहे हो?"

इस घर की
आबोहवा को है
इन दीवारों को है
उसका इन्तजार
कि वो आयेगा
आकर
बदल देगा मेरा जहां
भर देगा खुशियों से
पूरा मकान
और मुस्कान
वीरान सी ज़िन्दगी में.


ये इन्तजार
अब आदत बन गयी है

माँ- बाप

पिछले जन्मों का फल था
जो ऐसे घर में पैदा हुआ
दोस्तों, मेरे माँ बाप
मुझसे बेइन्तेहाँ प्यार करते हैं
और मेरे लिए
कुछ भी कर देना
उनके लिए बहुत ही सहज है
पिताजी कहते हैं
कि मैं अपने बेटे के लिए
खुद को नीलाम भी करना पड़े
तो करूंगा
भीख भी मांगना पड़े
तो मागूँगा

मिठाईयां, नमकीन, चाकलेट
कुछ भी लाते हैं
तो चाहते हैं कि सारा का सारा
बेटा खा जाए
जैसे मेरे खाने से
उनका पेट भी भर जाएगा
क्या लोजिक है
तो ऐसे हैं मेरे माता पिता
तबियत खराब हो जाए
तो रात भर ऐसे
परेशान हो जाते हैं कि पूछो मत
माँ को आंसूओं की तो जैसे
कोई कदर ही नहीं
जब तब बहा देती है
कितना प्यार करते हैं वे मुझसे
कह पाना मुश्किल है.

और मैं कैसा बेटा हूँ
बारहवीं पास करने के बाद
घर त्याग दिया
अब घर मेहमान बनकर जाता हूँ
अच्छी नौकरी कर सकता था
माता पिता की मदद कर सकता था
लेकिन तभी याद आया
कि मुझे तो कुछ और ही करना है
कि मेरा एक सपना भी है
कि मुझे नौ से पांच की
नौकरी तो नहीं करनी है
इसलिए
मुंबई चला आया
उन्हीं सपनों की खातिर.

अब यहाँ अकेले रहता हूँ
इधर उधर खा लेता हूँ
बीमार होता हूँ
तो कोई पूछने नहीं आता
अब आज ही कर्फियू लगा था
कुछ खाने निकला था कि
पुलिसवाले ने ठोंक दिया
काफी जख्म हो गया है
दर्द बढ़ता जा रहा है
चला नहीं जा रहा है
घर में कुछ खाने को नहीं है
कोई एक रोटी देने वाला नहीं
घर में पंखा भी नहीं
गर्मी से जख्म और बढ़ जाता है
इधर
रात में चूहे परेशान करते हैं
सोने नहीं देते
ठीक सिरहाने
बिलों में खुदाई अभियान चलाते हैं
चूकिं चटाई पर सोता हूँ
चींटीयाँ काट काट कर
बुरा हाल कर देतीं हैं
फिर भी यारों
नींद आ ही जाती है
थोड़ी मशक्कत के बाद.

चाहता तो
एक आराम की ज़िन्दगी जी सकता था
क्योंकि मैं आम आदमी बनके
नहीं जीना चाहता था
इसलिए
सब कुछ सहा
उन चंद सपनों के लिए
क्या कुछ नहीं किया
सिर्फ इसलिए कि
उन सपनों को देख देख कर ही
मैं बड़ा हुआ
जिनके बिना मैं
अधूरा सा लगता हूँ
जिनके बिना ज़िन्दगी बेमानी सी लगती है
मालूम नहीं
क्या होगा उन सपनों का
हर पल इनके चलते
दुःख और दर्द सहते सहते
उब सा गया हूँ
सोचकर ही परेशान सा हो जाता हूँ
अगर ये सपने
सच नहीं हुए तो?
डर लगता है कहीं
मैं आम आदमी की तरह ही
ना मर जाऊं.

मेरे जैसे स्वार्थी बेटे से
इन अभागे माँ बाप को
क्या सुख?
उनकी खोज खबर लेने वाला
कोई नहीं
अब उनकी तकलीफ
फोन कर देने से तो
दूर नहीं हो सकती
इस उम्र में जबकि
उन्हें मेरी ज्यादे जरूरत है
बच्चों की फ़िक्र में ही
रातें काटने की
उन्हें आदत पड़ गयी है.


उन्हें अपनी फ़िक्र
जाने कब होगी?