Tuesday, June 22, 2010

बरसात

दिल के संदूक को
खंगाला
वो ग़म हाथ लगा
जिस पर तुम्हारे काजल का
काला तिल चस्पा हुआ था
जिस पर तुम्हारे
चूमते वक़्त की
पडी थूक की बूंदे
अभी तक मौजूद थी

उनसे वैसी ही खुशबू आ रही थी जैसे
कभी तुम्हारे बदन से आया करती थी-
भीनी भीनी गुलाब जल की तरह
और हाँ
उसमें तुम्हारे बाल का
एक टूटा हुआ सिरा भी
चिपका पडा था.

बात पुरानी हो चुकी थी
मिट्टी की कई परतें पड़ चुकीं थीं
उसे पोंछा
चमकाया
तो उसमें मेरा चेहरा दिखने लगा
जैसे तुम मेरी पुतलियों में
अपना चेहरा तलाशती रहती
मुझे हंसी आई
गौर से सूना तो
तुम्हारी हंसी की खनखनाहट
साफ़ सुनाई दी
छुआ तो
फिसल गयीं मेरी उंगलियाँ
जैसे
तुम्हारी गोरी बाहों को
छूने से फिसला करतीं थी.

गिरते गिरते बचा
होश आया तो याद आया
सड़कों पर काई जमी पडी है
आजकल
इस शहर में
बरसात बहुत होने लगी है.

1 comment:

  1. babu ji dheere chalna ...barsat huee hai bade kichad hai is rah me !!!!!!!!!!

    ReplyDelete