कौन सुनता है तेरे दिल की बात
दिल तो बेकस है बेजुबान.
वो जिसे चाहता है दिलोजान से तू
देख तो कितना है बदगुमान.
ग़म -ए- इश्क ने मारा जिसको भी
होता कैसे नहीं लहू लहान.
चल दिया उकता कर दिल से एक दिन
बुझ गया है अब चिराग- ए- जहान.
भीड़ में खो गया हूँ ऐसे
जिस्म से रूह हो जैसे अनजान.
Friday, June 26, 2009
Thursday, June 25, 2009
बारिश का मज़ा
बारिश में मज़ा कहाँ
अगर छत छूती हो,
घुटने तक पानी में
घर से बाहर जाना हो,
ट्रैफिक में कार फँसी हो,
या पहिया पंचर हो जाये
आपकी दुपहिये का,
कीचड़ भरे सड़क पर
लगभग दौड़ते हुए
बस पकड़नी हो,
या एक बहुत जरूरी मीटिंग में
जाना हो.
बारिश का मज़ा तो तब है
जब घर बैठे
खिड़की से मुसलाधार बारिश का
नज़ारा देखा जाए
धुली धुली वादियों के बीच
गरमा गरम पकौडे के साथ चाय का
आनंद लिया जाए.
या फिर
उनकी बाहों में बाहें डाले
भींगने का लुत्फ़ उठाया जाए.
अगर छत छूती हो,
घुटने तक पानी में
घर से बाहर जाना हो,
ट्रैफिक में कार फँसी हो,
या पहिया पंचर हो जाये
आपकी दुपहिये का,
कीचड़ भरे सड़क पर
लगभग दौड़ते हुए
बस पकड़नी हो,
या एक बहुत जरूरी मीटिंग में
जाना हो.
बारिश का मज़ा तो तब है
जब घर बैठे
खिड़की से मुसलाधार बारिश का
नज़ारा देखा जाए
धुली धुली वादियों के बीच
गरमा गरम पकौडे के साथ चाय का
आनंद लिया जाए.
या फिर
उनकी बाहों में बाहें डाले
भींगने का लुत्फ़ उठाया जाए.
Monday, June 22, 2009
बेतरतीब ख्वाब
आप यकीं नहीं करेंगें
मगर यह सब सच है.
शाहरुख़ से यह मेरी दूसरी मुलाकात थी
काफी बातें हुईं
इधर उधर की
काफ़ी की चुस्कियां लेते लेते
एक दिन पहले ही
आमिर और सैफ
मेरे घर आये थे
कारन और अजय के घर
मैं खुद हो आया था
अजय ने न्यासा को
मेरी बाहों में थमा दिया था
इतनी नाज़ुक और प्यारी थी कि
उसे छूने से भी डर लग रहा था
मैंने उसके गालों को
हलके से चूम लिया
और वो चुमते ही सो गयी
घंटों सीने से चिपकाये
मैं गुनगुनाता रहा
माधुरी के साथ मैंने
Accountancy की classes ली है
मनीषा और जूही के साथ
कई बार
सैर सपाटे पर गया हूँ
गोविंदा से धक्का मुक्की हो चुकी है
जाने किस बात पर.
भंसाली से कई मुद्दों पर बहस हो चुकी है
सुन्नी देओल ने एक बार
मेरी जान बचायी थी
एक काले नाग को मार कर
कितनी फिल्में बना चूका हूँ अब तक
अब तो पूरा बॉलीवुड जानने लगा है मुझे
अनिल और मुकेश ने तो पूरी कोशिश कि थी
मेरी जान लेने कि
दरअसल अनिल को लगा था मैं
मुकेश का आदमी हूँ
और मुकेश को लगा मैं अनिल का हूँ
एक दफा जेल भी जा चूका हूँ
घोटाले का मामला था
छ लाख गबन हुए थे
चार रबिन्द्रनाथ
बाकी मेरे हाथ आये थे
कसूर दरअसल
टैगोर साहेब का ही था
मैं तो अनायास ही
मदद करने चला गया था.
आप भी जान लीजिये
क्या क्या गूल खिलाये हैं मैंने
सपनों में कुछ भी कर लेने की
बड़ी सहूलियत होती है.
मगर यह सब सच है.
शाहरुख़ से यह मेरी दूसरी मुलाकात थी
काफी बातें हुईं
इधर उधर की
काफ़ी की चुस्कियां लेते लेते
एक दिन पहले ही
आमिर और सैफ
मेरे घर आये थे
कारन और अजय के घर
मैं खुद हो आया था
अजय ने न्यासा को
मेरी बाहों में थमा दिया था
इतनी नाज़ुक और प्यारी थी कि
उसे छूने से भी डर लग रहा था
मैंने उसके गालों को
हलके से चूम लिया
और वो चुमते ही सो गयी
घंटों सीने से चिपकाये
मैं गुनगुनाता रहा
माधुरी के साथ मैंने
Accountancy की classes ली है
मनीषा और जूही के साथ
कई बार
सैर सपाटे पर गया हूँ
गोविंदा से धक्का मुक्की हो चुकी है
जाने किस बात पर.
भंसाली से कई मुद्दों पर बहस हो चुकी है
सुन्नी देओल ने एक बार
मेरी जान बचायी थी
एक काले नाग को मार कर
कितनी फिल्में बना चूका हूँ अब तक
अब तो पूरा बॉलीवुड जानने लगा है मुझे
अनिल और मुकेश ने तो पूरी कोशिश कि थी
मेरी जान लेने कि
दरअसल अनिल को लगा था मैं
मुकेश का आदमी हूँ
और मुकेश को लगा मैं अनिल का हूँ
एक दफा जेल भी जा चूका हूँ
घोटाले का मामला था
छ लाख गबन हुए थे
चार रबिन्द्रनाथ
बाकी मेरे हाथ आये थे
कसूर दरअसल
टैगोर साहेब का ही था
मैं तो अनायास ही
मदद करने चला गया था.
आप भी जान लीजिये
क्या क्या गूल खिलाये हैं मैंने
सपनों में कुछ भी कर लेने की
बड़ी सहूलियत होती है.
पडोसी
मैंने उनसे
कभी बात नहीं की थी
उन्होंने भी कभी
कोशिश नहीं की
हमारी नज़रें रोज मिल जातीं थीं
सुबह शुबह, दोपहर या शाम में
जब भी
खिड़की से बहार झांकता
वो मुझे देखते
मैं उन्हें देखता
और एक तरह से
अनजान बनकर भी
हम एक दुसरे को
जानने लगे थे
सुबह सुबह
अखबार लेकर बैठे रहते
घंटों ख़बरों के बीच
उलझे रहते
जब भी खिड़की से झांकता
सबसे पहले
उनका ही चेहरा दिखता
लेकिन वो चेहरा
अब कभी नहीं दिखेगा
क्यूंकि सुना
आज अचानक
उनके दिल की धड़कन रुक गयी
और ख़त्म हो गया
एक अस्तित्व
एक वजूद
एक ही पल में.
जिस बिस्तर पर वो सोते थे
जूते जो पहनते थे
जो घडी अक्सर
उनकी कलाई में लटकी रहती
जिसे वो अपना समझते थे
दरवाजे के बाहर
लावारिस पड़ी है
शायद, किसी को दान दे दिया जायेगा.
हम अजनबी थे
नाम तक नहीं जानते थे
कभी बात तक नहीं की थी
पर आज
उनकी कमी सी खलती है
बात करने को जी चाहता है. . .
कभी बात नहीं की थी
उन्होंने भी कभी
कोशिश नहीं की
हमारी नज़रें रोज मिल जातीं थीं
सुबह शुबह, दोपहर या शाम में
जब भी
खिड़की से बहार झांकता
वो मुझे देखते
मैं उन्हें देखता
और एक तरह से
अनजान बनकर भी
हम एक दुसरे को
जानने लगे थे
सुबह सुबह
अखबार लेकर बैठे रहते
घंटों ख़बरों के बीच
उलझे रहते
जब भी खिड़की से झांकता
सबसे पहले
उनका ही चेहरा दिखता
लेकिन वो चेहरा
अब कभी नहीं दिखेगा
क्यूंकि सुना
आज अचानक
उनके दिल की धड़कन रुक गयी
और ख़त्म हो गया
एक अस्तित्व
एक वजूद
एक ही पल में.
जिस बिस्तर पर वो सोते थे
जूते जो पहनते थे
जो घडी अक्सर
उनकी कलाई में लटकी रहती
जिसे वो अपना समझते थे
दरवाजे के बाहर
लावारिस पड़ी है
शायद, किसी को दान दे दिया जायेगा.
हम अजनबी थे
नाम तक नहीं जानते थे
कभी बात तक नहीं की थी
पर आज
उनकी कमी सी खलती है
बात करने को जी चाहता है. . .
Wednesday, June 17, 2009
ग़ालिब के कुछ चुनिन्दा शेर
ज़िन्दगी जब अपनी इस शक्ल से गुजरी 'गालिब'
हम भी क्या याद करेंगें कि खुदा रखते थे.
उग रहा है दरो- दीवार से सब्ज़ा, 'गालिब'
हम बयाबान में हैं और घर में बहार आई है.
तुने कसम मयकशी की खायी है 'गालिब'
तेरी कसम का कुछ ऐतबार नहीं.
इश्क ने 'गालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के.
इश्क पर जोर नहीं, है ये वो आतिश 'गालिब'
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने
जब तवक्को१ ही उठ गयी 'गालिब'
क्यूँ किसी का गिला करे कोई
होगा कोई ऐसा भी कि 'गालिब' को न जाने
शायर तो वो अच्छा है, पे बदनाम बहुत है.
जी ढूंढता है फिर वही फ़िरसत के रात दिन
बैठे रहे तसव्वुरे- जानां२ किये हुए.
तू मुझे भूल गया हो तो पता बतला दूं
कभी फित्राक़ में तेरे कोई नखचीर भी था.
पूछते हैं वो कि गालिब कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या?
गम नहीं तुने बर्बाद किया
गम यह है कि बहुत देर में किया.
१. उम्मीद २. महबूब के ख्याल
हम भी क्या याद करेंगें कि खुदा रखते थे.
उग रहा है दरो- दीवार से सब्ज़ा, 'गालिब'
हम बयाबान में हैं और घर में बहार आई है.
तुने कसम मयकशी की खायी है 'गालिब'
तेरी कसम का कुछ ऐतबार नहीं.
इश्क ने 'गालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के.
इश्क पर जोर नहीं, है ये वो आतिश 'गालिब'
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने
जब तवक्को१ ही उठ गयी 'गालिब'
क्यूँ किसी का गिला करे कोई
होगा कोई ऐसा भी कि 'गालिब' को न जाने
शायर तो वो अच्छा है, पे बदनाम बहुत है.
जी ढूंढता है फिर वही फ़िरसत के रात दिन
बैठे रहे तसव्वुरे- जानां२ किये हुए.
तू मुझे भूल गया हो तो पता बतला दूं
कभी फित्राक़ में तेरे कोई नखचीर भी था.
पूछते हैं वो कि गालिब कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या?
गम नहीं तुने बर्बाद किया
गम यह है कि बहुत देर में किया.
१. उम्मीद २. महबूब के ख्याल
Monday, June 8, 2009
लिफाफे
पर्वतों के उरोजों से जब झांकता था सूरज
कल कल करती झरने की जब बहती थी नाक
हवाएं जब सरगम गाती थी और
पत्तियों की सरसराहट गुदगुदाती थी
चद्दर में लिपटी रातें
भट्ठी में ठिठुरती बाहें अंगरायियाँ लेती थी. . .
इन बहुमंजिली इमारतों के दरम्यान
दफ़न हैं जिंदा लाशें
जहाँ न सर उठाने की इजाज़त है
न ही चाहत
जहाँ धक्कों की लत पड़ चुकी है
अपना भी लिया इस शहर को लेकिन
कभी कभी बिलकुल ही
पराया लगता है.
लगता है मैं इसका नहीं
मैं यहां का नहीं.
अब भी गूंजती हैं कहीं किलकारियां
बाकी है बुझा बुझा सा एहसास
और बचपन की कुछेक तरोताजा यादें
फटे लिफाफे में
कल कल करती झरने की जब बहती थी नाक
हवाएं जब सरगम गाती थी और
पत्तियों की सरसराहट गुदगुदाती थी
चद्दर में लिपटी रातें
भट्ठी में ठिठुरती बाहें अंगरायियाँ लेती थी. . .
इन बहुमंजिली इमारतों के दरम्यान
दफ़न हैं जिंदा लाशें
जहाँ न सर उठाने की इजाज़त है
न ही चाहत
जहाँ धक्कों की लत पड़ चुकी है
अपना भी लिया इस शहर को लेकिन
कभी कभी बिलकुल ही
पराया लगता है.
लगता है मैं इसका नहीं
मैं यहां का नहीं.
अब भी गूंजती हैं कहीं किलकारियां
बाकी है बुझा बुझा सा एहसास
और बचपन की कुछेक तरोताजा यादें
फटे लिफाफे में
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