बड़ी देर तक
खिड़की से झांकता रहा
रोज की तरह
कि कोई गुजरेगा
इन रास्तों से होकर
जिसके इन्तजार में
बरसों नहीं गुजरे
वो यूँ ही किसी दिन
गुजरेगा इधर से
और पुकार कर कहेगा
"किसकी राह देख रहे हो?"
इस घर की
आबोहवा को है
इन दीवारों को है
उसका इन्तजार
कि वो आयेगा
आकर
बदल देगा मेरा जहां
भर देगा खुशियों से
पूरा मकान
और मुस्कान
वीरान सी ज़िन्दगी में.
ये इन्तजार
अब आदत बन गयी है
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ये इन्तजार अब आदत बन गयी है
ReplyDelete--->>सुप्रसिद्ध साहित्यकार और ब्लागर गिरीश पंकज जी के साक्षात्कार का आखिरी भाग प्रकाशित हो चुका है । एक बार अवश्य पढे>>
bas thada intzar aur kar lo wo pal ab aane hi wala hai ...chal diya hai raste main hai....
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