नारी की तरह जीभ भी
चंचला और लालची होती है
असल में वही फसाद की
सारी जड़ रही है.
वरना पेट को
स्वाद से क्या मतलब?
पेट तो किसी भी चीज़ से
भरा जा सकता है.
मगर आदमी के अन्दर
अगर बेहतर खाने की इच्छा ना हो
कोई अभिलाषा ना हो
महत्वकांक्षा ना हो
फिर तो वह जानवर सरीखा ही है.
ज़िन्दगी में रंग ना हो
तो जीने का कहाँ आनंद?
अतएव
जीभ बिना पेट के होने का
कोई लाभ नहीं.
अफ़सोस आजकल
बिना जीभ वाली नस्लें ही
पैदा हो रहीं हैं.
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