दो नावों में चढ़ा हुआ हूँ
द्वंद्व में ऐसे फंसा हुआ हूँ
माँ कहती है उत्तर जा
मन कहता है दक्षिण जा
शाम का राशन ख़त्म हुआ
लकड़ी जलकर भस्म हुई
माँ कल भी तो खाई नहीं थी
खर्च सारी रकम हुई
बहना की शादी करनी है
बाप दमे से तड़प रहा है
फिर भी पीता जहर तम्बाकू
जिस्म उसका अकड़ रहा है
काना बनिया ना दे उधार
अक्सर माँ को रहे बुखार
बारिश में घर भी चूता है
रिसने लगी है हर दीवार
ऊँची ऊँची आसमां छूती
चारों तरफ खड़ी मीनारें
नन्हीं नन्हीं उनकी खिड़कियाँ
देखके मुझको करें इशारे
रात को सारे जब सो जाते
जगकर मैं सपने बुनता
उम्मीदों के पर लगाकर
आसमां में उड़ता रहता
सुबह सबेरे माँ जगाती
रूखा सूखा मुझे खिलाती
मुझको काम पे जाना होगा
ख़त्म है राशन याद दिलाती
पढ़ना लिखना मैं भी चाहूं
घर का भी तो ख्याल है रखना
किसको चुनूं मुझे बताओ
रोटी चुनूं कि सपना?
अवधेश कुमार
4 weeks ago

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