कभी कोई पूछे अगर
कि मैंने क्या किया इस ज़िन्दगी में
तो मैं यही कहूँगा
कि मैंने
बड़े बड़े ख़्वाब देखे
जो कभी पूरे नहीं हुए.
मरता रहा दम- ब- दम
दर्द से बिलबिलाता रहा
लेकिन इस कमबख्त दिल ने
उम्मीद की डोर थामी रही
मुझे यकीन दिलाता रहा
और मैं यकीन करता रहा
जितनी ही मात मिलती
हौसला उतना पक्का होता रहा
तो क्या?
वो जले कागज़ की तरह उड़ते रहे
तूफानों में किश्तियाँ
डूबती रहीं
लाखों नशेमन उजड़ते रहे
हवाएं तेज़ तो हो जाएँ ज़रा
चिंगारियों को आग होते
देर नहीं लगती.
अवधेश कुमार
4 weeks ago

बढ़िया रचना!
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