जख्मी दिल और छलनी कलेजा
बेगैरत आशिकों का अंजाम यही है.
आखिर लोगों ने कर लिया इश्क से तौबा
ये हुस्न यूँ ही बदनाम नहीं है.
कैस अब ना होंगे पैदा किसी जमाने में
क्यूंकि लैला का भी नामोनिशान नहीं है.
लगती हैं बोलियाँ इंसानों की आजकल
जज्बातों से खेलना यहाँ आम नहीं है.
अक्ल के नाम पे है बस मांस का इक लोथड़ा
"फेस बुकिंग". और कोई काम नहीं है.
भोर की हवा / लोला रिज / अनिल जनविजय
20 hours ago

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