यह नयी नसल है.
जिसे मौसिकी और ग़ज़ल में भी
डिस्को चाहिए.
इसे सुर और ताल की समझ नहीं
न ही समझना चाहती है.
कानों में दिन रात
इअर फ़ोन घुसाए,
जो बहरी होने पर आमादा है,
रेडियो जोकी की बकवास
और उलजलूल गानों में
मनोरंजन ढूंढती है.
मियां की मल्हार, राग भैरवी या दरबारी.
हर्मोनिअम और तबला
इसकी समझ से परे है
फास्ट फ़ूड की नसल है
मौसिकी भी वैसी ही चाहिए
यानी 'जंक म्यूजिक'.
अवधेश कुमार
4 weeks ago

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