Thursday, November 24, 2011

दीवाना- भाग दो

क्या बताऊँ मैं कैसे जहर पी गया
था तो कड़वा बहुत फिर भी मैं पी गया.

उसने छोड़ा नहीं था कोई भी कसर
मरते मरते भला कैसे मैं जी गया.

कुछ लिया कुछ दिया जाता है इश्क में
रातभर क्या मिला जोड़ता रह गया.

उसने चाही थी बस दो घड़ी की दोस्ती
और मैं था कि जो था वो सब दे गया.

भर गया हर जखम उससे पाए हुए
देखिये दाग दिल पे मगर रह गया.

मेरे सीने से लगकर कभी रोया था
वो काजल लगा शर्ट हाथ लग गया.

यह वही हैं कभी जो मेरे होते थे
मगर आज सिर्फ अजनबी रह गया.

मुद्दतों बाद फिर सामना जब हुआ
इक पुराना सा घाव कहीं जग गया.

Wednesday, November 23, 2011

दीवाना

आपको देखकर देखता रह गया
रातभर ख़्वाब में, सोचता रह गया.

इश्क में कुछ तो होश यारों रहता नहीं
खुद से लापता हुआ, लापता रह गया.

मैं समझने लगा आप भी समझ गए
थे लब सिले आँखों से, बोलता रह गया.

इक झलक से ही दिल ये बहल जाता था
मैं इधर से उधर, नापता रह गया.

हाथ जब भी उठे माँगा आपको ही रब से
मांगने की थी लत, मांगता रह गया.

आप रुसवा ना कर दें ये डर भी तो था
दिल में ही चाहता था, चाहता रह गया.

दोस्तों में मजाक बनके मशहूर था
बेहूदा शायद था, बेहूदा रह गया.

तय किया दिल की बात आज बोल दूंगा मैं
उसकी महफ़िल में जाके, ताकता रह गया.

है गुजारिश मेरी आशिकों की कौम से
जाके कह दो दीवाना, आपका मर गया.

Sunday, November 20, 2011

दिल के बहाने

दिल धड़कने का बहाना ढूंढें
तुमसे मिलने का बहाना ढूंढें
इस कदर बेक़रार रहता है
तुम्हें देखने का बहाना ढूंढें.

जब घटाओं से फुहार झरता है
जब फिजाओं पे निखार आता है
कहीं दो दिल जवान मिलते हैं
जब भी मौसम खुशगवार होता है
ख़्वाब बुनने का बहाना ढूंढें. दिल धड़कने का बहाना ढूंढें

तू है कमसिन नाज़ुक सी कली
तुझपे सोलह श्रृंगार सोहे
सुर्ख होंठों से छलकता है नशा
मुझे कजरारे नैना मोहे
कोई छूने का बहाना ढूंढें. दिल धड़कने का बहाना ढूंढें

Saturday, November 19, 2011

आप से मिलकर

आप आये ज़िन्दगी में खुदा बनके
दर्द आया जुबाँ पे दुआ बनके.

हमको तन्हाईयाँ जीने नहीं देंती
दिल का जो जख्म है सीने नहीं देंती
जख्म गहरा गया है बढ़ते बढ़ते.

अपनी हालत भी सुधर जायेगी
ग़म की आंधी भी गुजर जायेगी
सह गया सोचके ग़म हँसते हँसते.

अब तो आलम है कि रो नहीं पाते
रातभर लेट के भी सो नहीं पाते
उम्र हो गयी यूँ ही जगते जगते.

आपसे मिलके उम्मीदें हैं जगी
फिर से लौटी है होठों पे हंसी
आँख भर गयी कैसे कहते कहते.

खुशियाँ मिलती हैं तो डर लगता है
इस ख्याल से भी दिल उदास रहता है
रह ना जाए किस्मत बनते बनते.

हमको अपना बनाकर देखो
अपनी पलकों में बसाकर देखो
फिर से जी जायेंगें मरते मरते.

Friday, November 18, 2011

अफ़सोस

हुए नाकाम ज़िन्दगी में कुछ इस तरह से
खींच लाये वो कुछ, कर गुजरने की जद से.
ये उनका सुरूर-ऐ- उल्फत का ही असर था
लौट आये हम अपने, मरने की हद से.

हाल-ऐ-दिल जाना न देखा मुडके किसी ने
उन्ही रास्तों में खड़े थे, कबसे ही बुत से.
क्यूँ लुट जाने चले थे उसकी रानाइयों पे
खुदा से नहीं, ये सवाल है हमारा खुद से.

अफ़सोस उसने झूठा प्यार भी न जताया
वैसे अपने वादे से वो मुकर भी सकती थी.
तंगहाली थी पर ज़िन्दगी कोई मजबूरी न थी
इक टीस सी रह गयी कि, ये सुधर भी सकती थी.

Tuesday, November 15, 2011

दुनियादारी

अब तो आदत सी हो गयी है, चुप रहने की
हिम्मत नहीं होती है, कुछ कहने की.

लोग मतलब निकाल लेते हैं कई बातों की
मैंने जाना कि तहें होती हैं इन बातों की.

कुछ ना कहिये, चुप रहिये, देखते रहिये
अभी उतरेगी रंगत सबके चेहरों की.

गैर क्या अपने साए भी साथ छोड़ देते हैं
फ़िज़ूल बातें हैं, ना कीजै, जज्बातों की.

हुए हैं पाँव लहू- लहान इस कदर लेकिन
ख़त्म होती नहीं फुर्सत-ऐ- गुनाह, रास्तों की.

आज रोया हूँ मैं, छुपके, जी भर के बहुत
कि समझ आयी अहमियत मिरे अश्कों की.

Friday, November 11, 2011

परिवर्तन

हैं जेहन में आज भी
वो स्कूल बस
चाटवाले की ठेली, ग्वाले की डेरी
बनिए की दूकान
वो बड़ा सा नीम का पेड़
मंदिर की घंटी, रामधुन
फेरीवाले, नुक्कड़
वो गली, गली का मोड़
उसकी छत का मुंडेर
पत्थर का टीला, चबूतरा
बहते सीवर, संकरी सडकें

इस अजनबी मुल्क में
अपना शहर ढूँढता हूँ.


वो घंटों इन्तजार करना
उसके लौटने का
इक झलक देखने का
छुप छुप के उसे निहारते रहना
लूटना आँखों की मस्ती
बहकना इधर उधर खोये खोये
तडपना खनकती उस आवाज़ को सुनने के लिए
आँखों में आँखें डाले घंटों बतियाना
धडकनों का बढ़ना, साँसों का तेज़ होना

आज के बाजारू मुहब्बत में
वही असर ढूँढता हूँ.

वो सुकूँ भरी ज़िन्दगी
पक्षियों का चहचहाना
मुर्गे की बाग़, कोयक की कूक
घने बरगद की सुहानी छाँव
सर्दी में अलाव सेंकना
दोस्तों का घर
मौज मस्ती, वो बेफिक्री
किस्से कहानियाँ, कहकहे
चैन की नींद

अलसायी शाम, महकती सुबह
दिन- दोपहर ढूँढता हूँ.

तुलसी का पेड़
होली, रंगोली, मेंहदी और गुलाल
माँ के हाथ का बेसन के लड्डू
गाजर का हलवा, पूरी, पुआ और खीर
रिश्तों की मिठास, गर्माहट स्पर्श की
माँ- बाबा, दादा- दादी,
भैया- दीदी, नाना- नानी
चाचा- चाची और फूफी
मामा- मामी और मौसियाँ

फोन और फेसबुक के दौर में
रहा कसर ढूँढता हूँ.

कुछ छूट गए थे प्रश्न
उनके उत्तर ढूँढता हूँ.
कितना कुछ बदल गया
यही अंतर ढूँढता हूँ.