Tuesday, November 15, 2011

दुनियादारी

अब तो आदत सी हो गयी है, चुप रहने की
हिम्मत नहीं होती है, कुछ कहने की.

लोग मतलब निकाल लेते हैं कई बातों की
मैंने जाना कि तहें होती हैं इन बातों की.

कुछ ना कहिये, चुप रहिये, देखते रहिये
अभी उतरेगी रंगत सबके चेहरों की.

गैर क्या अपने साए भी साथ छोड़ देते हैं
फ़िज़ूल बातें हैं, ना कीजै, जज्बातों की.

हुए हैं पाँव लहू- लहान इस कदर लेकिन
ख़त्म होती नहीं फुर्सत-ऐ- गुनाह, रास्तों की.

आज रोया हूँ मैं, छुपके, जी भर के बहुत
कि समझ आयी अहमियत मिरे अश्कों की.

Friday, November 11, 2011

परिवर्तन

हैं जेहन में आज भी
वो स्कूल बस
चाटवाले की ठेली, ग्वाले की डेरी
बनिए की दूकान
वो बड़ा सा नीम का पेड़
मंदिर की घंटी, रामधुन
फेरीवाले, नुक्कड़
वो गली, गली का मोड़
उसकी छत का मुंडेर
पत्थर का टीला, चबूतरा
बहते सीवर, संकरी सडकें

इस अजनबी मुल्क में
अपना शहर ढूँढता हूँ.


वो घंटों इन्तजार करना
उसके लौटने का
इक झलक देखने का
छुप छुप के उसे निहारते रहना
लूटना आँखों की मस्ती
बहकना इधर उधर खोये खोये
तडपना खनकती उस आवाज़ को सुनने के लिए
आँखों में आँखें डाले घंटों बतियाना
धडकनों का बढ़ना, साँसों का तेज़ होना

आज के बाजारू मुहब्बत में
वही असर ढूँढता हूँ.

वो सुकूँ भरी ज़िन्दगी
पक्षियों का चहचहाना
मुर्गे की बाग़, कोयक की कूक
घने बरगद की सुहानी छाँव
सर्दी में अलाव सेंकना
दोस्तों का घर
मौज मस्ती, वो बेफिक्री
किस्से कहानियाँ, कहकहे
चैन की नींद

अलसायी शाम, महकती सुबह
दिन- दोपहर ढूँढता हूँ.

तुलसी का पेड़
होली, रंगोली, मेंहदी और गुलाल
माँ के हाथ का बेसन के लड्डू
गाजर का हलवा, पूरी, पुआ और खीर
रिश्तों की मिठास, गर्माहट स्पर्श की
माँ- बाबा, दादा- दादी,
भैया- दीदी, नाना- नानी
चाचा- चाची और फूफी
मामा- मामी और मौसियाँ

फोन और फेसबुक के दौर में
रहा कसर ढूँढता हूँ.

कुछ छूट गए थे प्रश्न
उनके उत्तर ढूँढता हूँ.
कितना कुछ बदल गया
यही अंतर ढूँढता हूँ.

Thursday, November 10, 2011

इश्क और फेसबुक

जख्मी दिल और छलनी कलेजा
बेगैरत आशिकों का अंजाम यही है.
आखिर लोगों ने कर लिया इश्क से तौबा
ये हुस्न यूँ ही बदनाम नहीं है.
कैस अब ना होंगे पैदा किसी जमाने में
क्यूंकि लैला का भी नामोनिशान नहीं है.
लगती हैं बोलियाँ इंसानों की आजकल
जज्बातों से खेलना यहाँ आम नहीं है.
अक्ल के नाम पे है बस मांस का इक लोथड़ा
"फेस बुकिंग". और कोई काम नहीं है.

Wednesday, November 9, 2011

तजुर्बा

हुस्न होगा वो जमाने के लिए
मेरे लिए तो यारों, मौत का सामान था.

दुश्वारियां रहीं जिस्त में हजारों तरह की
कमबख्त मरना ही बस, आसान था.

क्या क्या ना ग़म मिले वो भी बेहिसाब
क्या कहें मुझपे खुदा, इतना मेहरबान था.

दिल के मामलों में मैं बेवकूफ ही रहा
आज भी यही दिक् है, मैं तब भी परेशान था.

रंज है इल्म हो गया अहले जहां को
और मेरा दिल ही, मुझसे अनजान था.

किया दोस्तों पे ऐतबार मैंने खुद से ज्यादा
क्या खूब दोस्त मिले, हर दोस्त बेईमान था.

Friday, October 14, 2011

मंजिलें मिल जाती हैं.

हो डगर जितना भी कठिन
मंजिलें मिल जाती हैं
गर इरादा पक्का हो तो
मंजिलें मिल जाती हैं.

रास्ते बन जाते हैं
पर्वतों को तोड़कर
इक महासागर बनता है
बूँद बूँद जोड़कर.
हौसला मत छोड़ना बस
मंजिलें मिल जाती हैं.

दूसरों की बाद में
पहले दिल की सुन ले तू
दिल से थोड़ी गुफ्तगू कर
हो जा खुद से रू-ब-रू.
कुछ नहीं बस, खुद पे यकीं हो
मंजिलें मिल जाती हैं.

इक अमेरिकन था एडिसन
अपनी धुन में रहता था
रच गया इतिहास जो
दुनिया से वो कहता था.
आग हो सीने में तेरे गर
मंजिलें मिल जाती हैं.

Sunday, October 9, 2011

बच्चों के लिए स्वच्छता पर एक कविता

सुबह सवेरे जब भी उठो
ब्रश करना कभी ना भूलो
फिर करो चेहरे के सफाई
बड़ा जरूरी है ये सब भाई.

है खाना जैसे रोज जरूरी
उतना ही जरूरी है रोज नहाना
गर्मी सर्दी कोई हो मौसम
करो ना कोई कभी बहाना.

परहेज़ करो बाहर की चीज़ों से
खाओ धोकर फल- तरकारी
अगर ना मानो मेरी बातें
होगी तुमको निश्चय बीमारी.

डरेगी तुमसे हर बीमारी
खाओ पीओ बस ठीक तरह से
कुट्टी कर लो गंदी चीज़ों से
और ठाठ करो तुम रहो मज़े से.

खेलोगे कूदोगे पढोगे
तभी जो तुम स्वस्थ रहोगे
आस पास तुम रखो सफाई
इसी में है हम सबकी भलाई.

Wednesday, October 5, 2011

तनहा शाम

वो तो आये नहीं इस बार
तनहा फिर कटेगी शाम.

बेकरारी बढ़ी फिर से
परेशां इस कदर है दिल
संभाले कैसे खुद को हम
ना वो आये नज़र कबसे.
ना आया ही कोई पैगाम
तनहा फिर कटेगी शाम.

उनकी बातों में जादू है
नशा आँखों में है यारों
झूम कर चलें ऐसे
मचल जाएँ दिल के अरमाँ.
मज़ा देता नहीं अब जाम
तनहा फिर कटेगी शाम.

डूबकर यादों में उनकी
गुजर जाए ये ज़िन्दगी
ना कोई और ख्वाहिश है
सिवा चाहें उन्हें यूँ ही.
लव पे आये उन्ही का नाम
तनहा फिर कटेगी शाम.