Sunday, June 6, 2010

अबकी

अबकी आऊंगा तुमसे मिलने तो
गिले शिकवे भी दूर कर दूंगा
इसके पहले कि जम जाए तेरा गुस्सा
तेरे गुस्से के कई फांक कर दूंगा

लेपकर नमक और मिर्ची
रखना सिरहाने मेरे
माज लेना अपने आरजूओं को
ताकि होश रहें ठिकाने मेरे
तैर कर डुबकियां लगा लेना कई
जब भी पिघलेंगें जज्बात मेरे
इसके पहले कि ठण्ड लग जाये तुम्हे
अपनी गर्म बाहों में भर लूँगा

बातों की चाशनी लब से चखना
छानकर भींगें गेसुओं से
पाग लेना अपनी नज़रें
मेरी नज़रों की मिस्री मैं
सिंक जाएँ तुम्हारी साँसे भी
भाप की उडती सर्द आहों से
भूल पाऊं ना वो लम्हे सो
गर्म ताज़ा ही उन्हें रख लूँगा.

अबकी आऊंगा तुमसे मिलने तो
गिले शिकवे भी दूर कर दूंगा

ख़त

बात इतनी सी नहीं
कि तुमने ख़त लिखा

ख़त लिखने के पहले
कुछ सोचा होगा
बहुत कुछ महसूस किया होगा
तुमने याद किया होगा
पुरानी बातें
हमारी मुलाकातें
होंठों को चाटा होगा
दबाकर काटा होगा
हंसी भी छूटी होगी
पलकें मूँद कर
आँखों को मींचा होगा
साँसों को छोड़ा होगा
कुछ परेशानी में
कुछ बेकरारी में
इधर उधर
टहला होगा
सोफे पर बैठ कर भी
बेचैनी हुई होगी.

फिर ख़त लिखने का ख्याल आया होगा
लेकिन समझ में नहीं आया होगा
कि शुरू कहाँ से करें.
हाथ कांपें होंगें
दिल धड़का होगा
पसीने टपके होंगें
लिखकर काटा होगा
फिर से लिखा होगा
सोच सोचकर
कई दफा तुमने
मुस्कुराया भी होगा

मैं सब कुछ महसूस कर सकता हूँ
इस ख़त को पढ़कर

मुंबई

बस और ट्रेन के धक्कों से
सीधी हो जाती है कमर
सारा दिन धुंआ और धुल से
पेट जाता है मेरा भर
और जो रहा सहा होता है
सब भूल जाता है, पीकर.

That's Mumbai
The city, I hate to love.

मुसलमान

वह मुसलमान कहता था खुद को
जिहाद करने की बात करता था वो
ऐसा अल्लाह ने फरमान दिया है
बड़ी बड़ी बातें जो समझ से परे थीं
मरने मारने की बातें
कुरान की बातें
कौम की बातें
काफिर की बातें
मुहम्मद की बातें
क़त्ल की बातें
उसकी हर बात से
नफरत फैलती थी
खून टपकता था

मैंने पूछ लिया
"पहले पैदा कौन हुआ- इंसान या मुसलमान?
अगर खुदा ने मुसलमान बनाये
तो बाकी कहाँ से आये?"
वो तो बस आग बबूला हो गया.
चीखा
"काफिर है. मार डालो इसे".

पहले मैं अक्सर समझता था
अल्लाह इंसानों से प्यार करता है
मुसलमानों से नहीं
मैं गलत था शायद.

छोटी बात

कहने को तो वो
छोटी सी ही बात थी
पर दिमाग में
यूँ जाके अटकी
कि बस खून ही खून
हो गया
काफी जखम सा बन चुका है
और रह रह कर
उसका पीब
रिसता रहता है.

किसने कहा
वो छोटी बात थी?

अश्क़

पानी की जो बूँद गिरी थी
आँखों के कोनों से
लुढ़कती लुढ़कती
ख़त्म होती
इकठ्ठी होती
आगे बढती हुई
नाफ़१ में जा गिरी
लगा अब घास उग आएगी. . .

अहा!! क्या कहूं
मालूम होता है जैसे
सहरा में दूर कहीं
छोटी सी पोखर
अपने वजूद पर इतरा रही हो. . .
दिल की धडकनों से
गोया पोखर सिहर जाती हो.

साथ लाई थी वो
काजल की
धुली धुली सी उदासी
जो हरसूं फ़ैल चुकी थी
साथ साथ
सबाहत२ और लताफत३ भी
धो लाई थी.

फिर वह पानी
नौ-ब-नौ४
मीठा हो गया.


माएने: १ नाभि, २ गोरा रंग, ३ कोमलता, ४ बिलकुल ताज़ा.

Saturday, February 27, 2010

मैं और मेरा फ्रसट्रेशन

मैं और मेरा फ्रसट्रेशन
अक्सर ये बातें करते हैं
कि ऐसा होता तो कैसा होता
वैसा होता तो कैसा होता
एक मस्त रेसिंग कार होती
मेरी खूबसूरत सी गर्ल फ्रेन्ड होती
जिसे लोंग ड्राइव पर दूर कहीं ले जाता
मैं और मेरा फ्रसट्रेशन
अक्सर ऐसी बातें करते हैं

किसी कम्पनी का मालिक होता
या अच्छी नौकरी होती
प्यारी सी पतिव्रता पत्नी होती और
मेरे तीन चार प्यारे प्यारे चूजे
बडा सा बंगला होता
दस बारह नौकर होते
मेरा बोस भी मेरे यहाँ नौकरी करता
और फोकट की दो- चार गालियाँ खाता
बाप दादा की छोडी इतनी जाय्दाद होती
कि मैं दोनो हाथों से लूटाता
मैं और मेरा फ्रसट्रेशन
अक्सर ये बातें करते हैं

न किसी का डर होता
न किसी चीज से खौफ़ होती
जब भी गुस्सा आता तो लगे हाथ
दो दो जमा देता
लिफ्ट न देने वाले रिक्शेवाले को
तंग करने वाले पोलिसवाले को
घूस मागनेवाले सरकारी बाबू को
मैं पिछले जन्म में जरूर किसी
सूबे का राजा रहा हूँगा
जिसकी आत्मा ने अभी तक
आपनी आद्तें नहीं बदली.
अब अफसोस तो यह है कि
राजे रजवारों का न जमाना रहा
न मेरे वालिद ने इतनी
जायदाद बटोरी
कि मैं नौकरी के मायाजाल से
मोक्ष पा सकूँ
कहने को बहुत कुछ है दिल में
लेकिन किससे कहूँ
आखिर कब् तक यूं ही खामोश रहूँ
और सहूँ
कब् तक दिल के अरमानों को हवा देता रहूँ
सुलगाता रहूँ?
जी तो चाहता है कि चीख चीख कर
चिल्ला चिल्ला कर लोगों को बता दूँ
कि हाँ मैं फ्रसट्रेटेड हूँ
फ्रसट्रेटेड.