कहीं किसी रोज़
एक बूँद गिरा आसमान से
गिरते गिरते सोचा उसने
कि जा गिरूँ किसी नदी में
या झरने में
काश कि गिरूँ समंदर में
और समा जाऊं
उनफ़ती लहरों में
समेट लूं साड़ी कायनात
गरज गरज कर कह दूं
जमाने से
दम है तो आ आजमा ले
अपनी ताक़त
कर ले अपने शिकस्त का
यकीन.
डर भी था उसे कहीं
गिर ना जाए
किसी गंजे के सर पर
धोबी घाट में या
किसी बदबूदार गटर में
"ज्यादा सपने मत देख".
साथी बूँद बोला था.
मगर कहाँ ऐसा होता है
कि जो चाहो वो हो भी जाए?
गिर गया वह किसी परितक्य सी
शांत पड़ी पोखर में
कुछ बुलबुले उठे
और फिर . . .
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With regards
Deepak
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नफ़रत करना मुश्किल है / इरीना शुवालवा / अनिल जनविजय
55 minutes ago

bahut hi gaharayi hai apaki rachana me bandhu....
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